हम आप और वो जो हम समझ पाऐं...................
सोमवार, 16 जनवरी 2012
सोमवार, 18 जुलाई 2011
आतंकवाद के मुद्दे पर ये नाटक क्यूँ ?
मुंबई शहर हादसों का शहर है............. हिन्दी फिल्म का ये गाना तब भी ये सोचकर नहीं लिखा गया होगा लेकिन बीते कुछ सालों की बात की जाए तो ऐसा लगने लगा है कि मुंबई शहर सचमुच हादसों का शहर बन गया है । इक्कतीस महीने पहले हुए आतंकवादी हमले के दहशत से अभी पूरी तरह शहर की जनता बाहर भी नहीं निकल पाई थी, आम जिंदगी उन खौफ़नाक यादों के मंजर से बाहर निकलने की कोशिश हीं कर रही थी कि अचानक मुंबई के अतिव्यस्त माने जाने वाले ओपेरा हाउस, झवेरी बाजार, और दादर में फिर से क्रमवार तीन बम विस्फोट ने पूरी हिन्दुस्तानी आवाम के आँखों की नींद गायब कर दी । इस हमले में 18 लोगों की मौत हो गयी और सैकड़ों लोग घायल हो गये, इन मासुम लोगों की मौत के इस खेल में किसी ने अपना भाई खोया तो किसी ने अपना बेटा किसी ने अपने पति को खोया तो किसी बच्चे के सर से बाप का साया उठ गया । लेकिन घटना के ठीक बाद से हीं इस पर सियासी गीत गाये जाने लगे, आरोप-प्रत्यारोप और घटना पर सफाई देने का काम तेजी से चलने लगा । सुरक्षा एजेंसी हो या जांच एजेंसी या फिर सरकार सब का रवैया एक सा था हर कोई बस इस घटना पर या तो सफाई देने के मकसद से मीडिया के सामने हाजिर हो रहे थे या इस घटना पर अफसोस जताने के लिए। इतना वक्त गुज़र जाने के बाद भी आज तक इस घटना से जुड़े लोगों को पकड़ पाने में या उसका पता लगा पाने में सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह से नाकाम रही हैं । ऐसा नहीं है कि देश में ऐसी घटनाऐं पहले नहीं हुई, समय-समय पर दिल्ली, अजमेर, अहमदाबाद, बैंगलुरु जैसे कई शहर इन आतंकी हमलों का दंश झेलते आ रहे हैं, लेकिन इतना कुछ होने के बाद भी सुरक्षा एजेंसियों की लचर व्यवस्था से देश को इस तरह के आतंकी हमलों से दो-चार होना पड़ रहा है । इस तरह की आतंकी गतिविधियों में नुकसान सीधा-सीधा देश की भोली-भाली जनता का होता है ।
ऐसे हमले के बाद सुरक्षा एजेंसियां, जांच एजेंसियां और सरकार या तो एक दूसरे पर दोषारोपण कर रही होती हैं या एक दूसरे के बचाव में खड़ी हो जाती है । ऐसे में देश की सुरक्षा व्यवस्था भगवान भरोसे है यह कहना गलत नहीं है । भारत की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले इस शहर को अगर इस तरह की दहशतगर्द ताकतों का बार-बार निशाना बनना पड़ रहा है तो यह कोई अजीबो-गरीब बात नहीं है, क्योंकि दहशतगर्दी फैलाने वाले इन शैतानों को यह अच्छी तरह से पता है कि किसी भी देश में दहशत फैलाने के लिए पहले उस देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने की जरूरत है । ऐसे में एक तरफ तो इन दहशतगर्द ताकतों की सह पर देश के अंदर जाली नोटों का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है, वहीं दूसरी तरफ समय-समय पर देश के बड़े शहरों में बम के धमाके और गोलीबारी जैसी घटनाओं को अंज़ाम दिया जा रहा है । भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई इन दहशतगर्द ताकतों की लिस्ट में नंबर वन पर आता है, ऐसे में मुंबई जैसे शहर की सुरक्षा बहुत अहम हो जाती है । लेकिन सुरक्षा की इस तरह की चुक इस बात की तरफ स्पष्ट इशारा करती है कि सुरक्षा एजेंसी हो या सरकार कोई भी अपने कर्तव्य का निर्वाह सही ढ़ंग से नहीं कर रही है । इतने सारे आतंकी हमलों के बाद भी न तो सुरक्षा एजेंसियां हीं सर्तक हो पायी हैं न हीं सरकार इन हमलों से देश को बचाने की कोई ठोस व्यवस्था कर पाई है ।
हां, लेकिन सरकार के अंदर बैठे कुछ नेता इतना कुछ हो जाने पर भी अपनी पीठ थपथपाते नजर आते हैं, मुंबई में आतंकी हमले के बाद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह का बयान आया कि भारत आज भी पाकिस्तान से बेहतर स्थिति में है, क्योंकि पाकिस्तान में तो हर दिन हर सप्ताह इस तरह के बम धमाके होते रहते हैं । यह बयान दिग्विजय सिंह कांग्रेस के दूसरे महासचिव राहुल गांधी के बयान के बचाव में दे रहे थे । राहुल गांधी ने इस हमले के ठीक एक दिन बाद मीडिया के सामने यह बयान दिया था कि देश में होने वाले प्रत्येक आतंकी हमले को रोकना मुमकिन नहीं है । उन्होंने कहा कि इन हमलों को रोकने पर स्थानीय स्तर पर प्रयास करने की जरूरत है । राहुल ने ये भी कहा कि ऐसे 99 फीसदी हमले रोके जा चुके हैं । इन नेताओं को ये पता होना चाहिए की 9/11 के बाद अमेरिका में कोई आतंकी हमला नहीं हुआ ऐसे में भारत को इस तरह के हमलों से बचाने के प्रयास न करना और केवल इस पर सफाई देकर ये नेता क्या करना चाहते हैं समझना थोड़ा मुश्किल लगता है । पी चिदंबरम ने तो यहां तक कह दिया कि हमारा देश दुनिया के सबसे अशांत पड़ोसियों से घिरा हुआ है । इसलिए देश का हर शहर असुरक्षित है । जब गृहमंत्री के बयान इस किस्म के होंगे तो देश की सुरक्षा व्यवस्था कैसी होगी यह समझ पाना नामुमकिन नहीं है, उपर से कांग्रेस के एक नेता का बयान आता है कि 26/11 के 31 महीने के बाद देश में कोई आतंकी हमला हुआ है यह सरकार की बहुत बड़ी उपलब्धि है । सवाल यह है कि क्या 31 महीने का समय देश में आतंकी हमला न होने के लिए लंबा समय है या देश को कभी इन हमलों से पूरी तरह से निजात मिल पाएगा ?
इस बीच मुंबई हमले पर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के कई ऐसे बयान भी आ गये जिनसे यह स्पष्ट हो गया कि ये बयान मुंबई की जनता के लिए सांत्वना स्वरूप नहीं दिए गए बल्कि राजनीति से औत-प्रौत होकर दिए गए थे । अपने बयान में दिग्विजय सिंह ने कहा कि मुंबई धमाकों में हिंदू संगठनों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पास बम बनाने के कारखाने हैं । ऐसा नहीं है कि इस तरह की बयानबाजी पहली बार हुई है इससे पहले राहुल गांधी ने भी कहा था कि देश को हिंदू आतंकवादियों से ज्यादा खतरा है । लेकिन पार्टी को ये समझने की जरूरत है कि आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता देश को सुरक्षा से मतलब है न कि आतंकवाद के जातिगत पहचान से, देश में शांति कायम करने की जरूरत है न कि मजहबी ताने देकर किसी खास मजहब के लोगों को वोट बैंक की राजनीति के लिए जनता की नजरों में गिराने की, इस तरह की बयानबाजी से कोई नतीजा नहीं निकलने वाला है । जरूरत है तो बस आतंकवाद के बढ़ रहे जहरीले फन को कुचलने की । मुंबई के लोगों को लाखों सलाम है जिन्होंने 31 महीने में हुए इस दूसरे आतंकी हमले के बाद भी साहस का परिचय दिया और आम जिंदगी इन हमलों के बाद भी बिना रूकावट के चल रही है, इन नेताओं से तो बेहतर आतंकवाद को करारा जबाब मुंबई की आवाम ने दिया है इसलिए सलाम मुंबई..................
बुधवार, 11 मई 2011
सरकार गरीब गरीबी और किसान
भारत के आजादी के इतने वर्ष बीत जाने के बाद विकास की दिशा और दशा दोनों में हीं बदलाव आया है। अब गाँवों को बिजली, शिक्षा, पानी, सड़क, संचार, स्वास्थ्य सुविधाओं से करीब-करीब जोड़ दिया गया है।सुदूर के कुछ गाँव और शहर जिनमें अबतक इनका अभाव है उनको भी मुख्य धारा में लाने की हर संभव कोशिश की जा रही है। लेकिन फिर भी न जाने क्यूँ ऐसा लगने लगा है जैसे ये सबकुछ केवल कागजी कारनामे हैं। केन्द्र और राज्य सरकार विभिन्न परियोजनाओं के जरिये देश के हर गाँव-छोटे शहरों और कस्बों को मुख्यधारा से जोड़ने का या उन तक विकास की रोशनी पहूँचाने का हर संभव कागजी प्रयास कर रही है, ऐसा स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है। फिर भी देश में इतने विकास के बाद भी किसी चीज में बदलाव नहीं आया है तो वह है गरीब, गरीबी और किसानों की दशा।
आजादी के बाद से किसानों की समस्याओं का कोई सही निदान सरकार ढूँढ़ पाने में असफल रही है। किसानों के लिए सरकार न तो उत्तम बीज की समुचित व्यवस्था कर पाई, न खाद की, न ही कृषि संबंधित जानकारियों को मुहैया कराने का इंतजाम कर पाई। कृषि के तकनिकी उपकरण भी मुहैया नहीं हो पाये हैं। कृषि के लिए बिजली और पानी की समुचित व्यवस्था करने में भी सरकार अक्षम रही है।लेकिन ऐसा नहीं है कि यही हालात सरकारी दस्तावेजों का भी है उन दस्तावेजों और आंकड़ों की माने तो सरकार इन सभी सुविधाओं को किसानों तक पहूँचा चुकी है।इनमें से अनेक परियोजना का फायदा सरकारी दस्तावेजों में हीं सही किसान लगातार उठा रहे हैं। उपर से सरकार किसानों के समर्थन में कभी-कभी हीं सही किसान अंदोलनों के बाद कृषि उत्पादों के समर्थन मूल्य में इजाफा करती रही है।
लेकिन सरकार का कृषि उत्पादों का समर्थन मूल्य हमेशा बाजार की कीमतों से काफी कम होता है जिस कारण किसानों को मुनाफे का छोटा सा हिस्सा मिल पाता है। उपर से अगर प्रकृति का कहर टूट पड़ा तो किस मुनाफे की बात तो दूर दाने-दाने को किसान मोहताज हो जाते हैं।
सरकार द्वारा किसानों से खरीदा गया अनाज सरकारी गोदामों के अंदर और बाहर सड़ता रहता है लेकिन गरीबों के बीच मुफ्त में इसका आवंटन सरकार उच्चतम न्यायालय के द्वारा फटकार लगाने पर भी नहीं करती है।
इन समस्याओं का जिक्र इसलिए भी जरूरी था क्योंकि 1995 से लेकर 2011 तक केवल विदर्भ में लाखों किसान इन समस्याओं की वजह से आत्महत्या कर चूके हैं।कृषि के महंगे तकनिकी उपकरणों की खरीददारी से लेकर विदेशों से मंगाये गये महंगे बीज के लिए किसानों ने बैंकों और अन्य सरकारी संस्थानों से ये सोचकर कर्ज लिया की पैदावार अच्छी होगी अच्छी कीमत मिलेगी तो फसल से मुनाफा भी अच्छा होगा और आर्थिक स्थिति सुधर जायेगी। लेकिन इनकी सोच के विपरित परिणामों ने किसानों की कमर तोड़ दी और किसानों की हालत बद से बदतर होती चली गई। उपर से ऋण का बोझ बढ़ता चला गया अन्तत: ऋण वसूली के लिये बैंकों और अन्य संस्थानों के लोगों का आना शुरू हो गया किसानों के साथ ऋण वसूली के लिए किए जा रहे व्यवहार असहनीय होने लगे और अन्तत: किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ा और आज भी विदर्भ में किसानों द्वारा आत्महत्या का यह सिलसिला जारी है।
इतना कुछ होने के वाबजुद भी केन्द्र और राज्य सरकार मिलकर किसानों के आत्महत्या के इस प्रयास को रोकने का रास्ता नहीं निकाल पाई हैं। लेकिन सरकारी दस्तावेज वास्तविकता से परे है दस्तावेजों की माने तो वहाँ स्थिति सामान्य है लेकिन स्थिति वहाँ आज भी जस की तस बनी हुई है।
ये अलग बात है कि किसी भी देश के विकास में उस देश का मध्यम वर्ग अहम भूमिका निभाता है। लेकिन भारत जैसे कृषि प्रधान देश के गर्भ में अगर कुछ पल बढ़ रहा है तो वह है गरीब गरीबी और किसानों की दूर्दशा। देश में लगातार किसान आंदोलन होते रहे हैं। सरकार उच्च और मध्यम वर्ग के लोगों को फायदा पहूँचाने के लिए, सुविधा मुहैया कराने के लिए कई दूरदर्शी परियोजनाओं पर काम कर रही है। ये परियोजनाऐं सरकारी दस्तावेजों से निकलकर अपना स्वरूप भी आसानी से ग्रहण कर रही हैं। लेकिन निम्न तपके के लोगों के लिए बनाई गई परियोजना सरकारी दस्तावेजों में सजा कर बनाई जाती हैं और धीरे-धीरे इन परियोजनाओं को सरकारी दीमक हीं चाट जाते हैं। इन दस्तावेजों में रह जाती हैं केवल कोरे कागज जिन पर योजनाऐं टंकित की गई होती हैं।
उत्तर प्रदेश में वर्त्तमान में चल रहे यमुना एक्सप्रेस वे परियोजना के लिए सरकार किसानों से जमीन अधिग्रहण करने पहूँची तो किसानों ने इसका खुलकर विरोध किया। किसान सरकार से पर्याप्त मुआवजा और नौकरी की मांग कर रहे थे। जब सरकार किसानों की मांग को अनसुना करने लगी तब किसानों ने सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया। किसान सड़कों पर सरकार के खिलाफ उतर आये लेकिन हद तो तब हो गई जब उत्तर प्रदेश सरकार ने किसानों के आंदोलन को दबाने के लिए बल प्रयोग करना शुरू कर दिया। उत्तर प्रदेश में किसानों का ये आंदोलन नयी बात नहीं है इसके पहले दादरी में भी किसानों ने सरकार को जमीन देने से इनकार कर दिया था और अन्तत: सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार द्वारा जमीन अधिग्रहण की कार्रवाई पर रोक लग पायी थी। कमोवेश किसानों की ऐसी हालत देश के हर हिस्से में है। किसानों की ऐसी हालात के लिए जितना जिम्मेवार राज्य सरकार है उतना हीं केन्द्र सरकार भी है।
मजेदार बात ये है कि एक तरफ किसान जल रहे हैं आत्महत्या कर रहे हैं देश में महंगाई बढ़ रही है गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर कर रहे लोगों की संख्या में कमी नहीं आ रही है फिर भी सरकारी परियोजनाओं का रोज नया प्रारूप इनके उत्थान के लिए तैयार किया जा रहा है। इसी बीच योजना आयोग को उच्चतम न्यायालय की फटकार मिलती है। गरीबी पर तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट में स्पष्ट दर्शाया गया है कि देश की 35 प्रतिशत आबादी गरीब है रिपोर्ट में यह भी है कि गाँव में 15 रु. तक प्रतिदिन और शहरों में 20 रु प्रतिदिन तक खर्च करनेवाले लोग गरीब हैं समिति की इस रिपोर्ट पर गौर किया जाये तो साफ हो जाता है कि देश में अब गरीब लोग नहीं हैं ऐसे में सरकार द्वारा दी जानेवाली बीपीएल व्यवस्था को समाप्त कर देने की जरूरत है। उच्चतम न्यायालय को सरकार और योजना आयोग की इस आंकडे पर आपत्ति होना तो सही ही है क्योंकि देश में जनता की स्थिति स्पष्ट कर रही है कि सरकार द्वारा गरीबी उन्मुलन और रोजगार मुहैया कराने के सारे कार्यक्रम विफल हो चूके हैं। नरेगा और मनरेगा जैसी योजना पर सरकार द्वारा खर्च किया जाने वाला धन देश की राजधानी से गाँवों तक पहूँचने तक समाप्त हो चूका होता है। सरकारी कागजों पर रोजगार भी मुहैया हो जाता है और मजदूरी भी दे दी जाती है। ऐसे में गरीबों की पहचान करने का यह तरीका तो बेहद लुभावना है। देश में अगर सही तरीके से जाँच की जाऐ तो पता चलेगा कि बीपीएल कार्डधारक ऐसे लोग हैं जो किसी भी हिसाब से इस श्रेणी में नहीं आते हैं।
केन्द्र और राज्य सरकार ऐसी व्यवस्था के तहत अगर योजनाओं का प्रारूप तैयार करती रहीं तो देश में न तो गरीब कम होंगे न गरीबी और न हीं किसानों और मजदूरों की दशा में सुधार हो पायेगा। इतना कुछ करने पर भी स्थिति ढाक के तीन पात वाली हीं बनी रहेगी।
ऐसे में अगर उच्चतम न्यायालय सरकार की कार्यशैली और कार्यकुशलता पर सवाल उठाती है और समय-समय पर फटकार लगाती है तो यह बिल्कुल जायज है।
सोमवार, 9 मई 2011
शनिवार, 30 अप्रैल 2011
गरीब का बच्चा हूँ
तिनकों से जोड़ी झोपड़ी के,
बाहर एक हाड़ माँस के लोथड़े से,
बस निर्माण की गई,
प्रकृति की वह अनुपम छवि,
दिख गयी थी,
पता चल रहा था कि इनपर,
वही देवी मेहरबान है,
जिसका नाम गरीबी है,
आधे ढ़के तन से,
शरीर के कई अंग,
यूँ झलक दिखला रहे थे,
मानो पश्चिम की देवियों की तरह,
इन्हें भी कपड़ों से प्रेम न रहा हो,
लेकिन क्या करे,
गरीबी की देवी ने,
पश्चिम की देवी का यह लिवास,
इस हाड़ माँस वाली काया को,
श्राप स्वरूप सौंपा था,
उस अधनंगे तन में भी,
उस तिनके की झोपड़ी के चौखट पर,
वह अपने दुधमुहे बच्चे को,
अपनी छाती से लगाये,
बेशर्म होकर बेपर्दे में हीं लेकिन,
वह उस दुधमुहे को अपना,
दुध पीला रही थी,
सामने वहीं पास में जमीन पर,
एक और हड्डियों का ढाँचा,
मानो भगवान ने हड्डियों पर,
केवल चमड़े की तह चढ़ा रखी हो,
पेट यूँ निकला हुआ,
मानो पाषाण,
उसे सौगात में मिली हो,
एक कटोरे में,
चंद भात के दाने,
के साथ चिपटती दाल को,
खुद अपने कमजोर हाथों से,
उठाकर मुँह तक लाता था,
चावल के चंद दाने,
उसके मुँह में जाते,
और ज्यादा दाने,
जमीन को भेंट चढ़ जाते थे,
उसके कटोरे में,
उसके शार्गिद,
कोई और भी था,
भिनभिनाती मक्खियाँ,
उसके नाक से बहने वाली धारा,
जो निरंतर,
उसके भात दाल से मिलकर,
उसके पेट का रास्ता,
तय कर रही थीं,
लेकिन फिर भी,
वह बड़े मजे में,
उसी तरह भात के दानों को,
कटोरे से फिर उठाता,
और मुँह में ड़ालता,
शायद वह मन हीं मन,
खुश होकर,
गुनगुना रहा था,
कि मुझे क्या,
मैं तो जग में,
सबसे अच्छा हूँ,
जो मिलता है रूखा-सूखा,
उसी में जिन्दा रहने की
कोशिश करता हूँ,
क्योंकि मैं तो,
एक गरीब का बच्चा हूँ।
----------------------------------------(गंगेश कुमार ठाकुर)
बुधवार, 6 अप्रैल 2011
ऐसा हीं होता है।
http://gangesh-aisadeshhaimera.blogspot.com
ज़ज्बात के चंद छोटे-छोटे टुकड़े समेट लिये हैं मैंने,
अपनी आकांक्षाओं को दामन में लपेट लिया है मैंने।
अब अंजाम कुछ भी हो प्यार का या वफाई का,
हर उलझते रिश्तों में उलझकर जीना सीख लिया है मैंने।
पत्थरों को लाखों बार तरासा जाए या घिसा जाए,
दाग तो पड़ जाता है लेकिन भगवान नहीं बसते इसमें।
श्रद्धा की बात है इसलिए रोज फूल चढ़ाते हैं इन पत्थरों पर हम,
वरना भगवान और इंसान दोनों बसते हैं ऐ दोस्त मुझमे और तुझमे।
शिकायत लाख की जाए दगा की या की जाए बेवफाई की,
शिकायतों से नहीं बदलती आदतें दोस्त न तुझमे और न मुझमे ।
आँखों में मचलते सपनों का समंदर कितना भी गहरा क्यूँ न हो,
तड़पते रह जाते हैं इंसान प्यासे होकर खुद के देखे सपनों में।
----------------------------------------------------------(गंगेश कुमार ठाकुर)
बुधवार, 30 मार्च 2011
क्रिकेट के बीच रिश्ते की तलाश
भारत और पाक के बीच मोहाली में खेले जाने वाले सेमीफाइनल मुकाबले के लिए भारतीय मीडिया ने पिछले सात दिनों में जो काम किया है वह काबिलेतारिफ है। हो भी क्यूँ नहीं मीडिया ने खेलधर्म को देश की प्रतिष्ठा के धर्म से जोड़ने का जो बहुमूल्य काम किया है।खैर इसमें केवल मीडिया की ही गलती नहीं है, गलती तो दोनों देशों के बीच के आपसी मतभेद का भी है। दोनों देश की जनता की मानसिकता का भी है जो मीडिया के इस महाप्रचार में शामिल हो गये हैं। मीडिया ने तो खैर इस महाप्रसाद को बेचकर अपनी जेब भरी लेकिन जनता का नुकसान हीं हुआ देश की इज्जत को दाव पर लगा सोचकर जनता पूरे खेल का वह आनंद नहीं उठा पायी जो आनंद खेल से प्राप्त किया जा सकता था। दोनों देशों का प्रतिनिधित्व कर रहे खिलाड़ी तो खेल भावना के साथ मैदान में उतरे थे लेकिन दोनों देशों की जनता के पैरों तले से जमीन पूरे खेल के दरम्यान खिसकती रही जब तक की खेल के आखिरी गेंद पर निर्णय नहीं आ गया।

वाह रे भारत और वाह रे भारतीय मीडिया “वसुधैव कुटुम्बकम्” के संदेश से दुनियाँ में अपनी पहचान बनाने वाला भारत, विश्व के मानचित्र पर विकास की धारा में सबसे तेज चलने वाला भारत आज के दिन अपने अहम में इतना मस्त था कि अपनी पहचान हीं भूल गया था।जी, हाँ बात कर रहा हूँ उसी भारत की जो विश्वगुरु के नाम से इस विशाल विश्वपटल पर जाना जाता है। जो आज भी विश्व की सबसे बड़ी और पुरानी सभ्यता-संस्कृति के लिए मशहूर है।भारत ने अपने गर्भ में इतिहास से लेकर वर्त्तमान तक की सभ्यता-संस्कृति के ना जाने कितने मोती छिपा रखे हैं। जहाँ के लोग दुश्मनों को भी गले लगाने के लिए जाने जाते हैं। क्षमादान की परंपरा की शुरूआत का श्रेय विश्व में जिस देश को जाता है वैसे देश में आज के इस पनपते दुश्मनी को देखें तो विस्मय की स्थिती पैदा हो जाती है और ऐसी दशा के लिए जिम्मेवार अधिकाधिक तौर पर मीडिया है और कोई नहीं।सैकड़ों भाषाओं, धर्मों, जातियों, समुदायों, संस्कृतियों और सभ्यताओं के बीच सामंजस्य स्थापित करके रखने वाला यह देश खेल में भी अपने पड़ोसी मुल्क से सौहार्दता नहीं रख पाता यह कैसे संभव है लेकिन अगर ऐसा हुआ है तो इसके लिए सबसे बड़ी जिम्मेवार दोनों देशों की मीडिया है ये सही है।दोनों देशों के इंसानों की मानसिकता में आया यह बदलाव सच में चिन्ता का विषय है कि विकास के इतने आयाम पा लेने के बाद भी दोनों देशों के लोगों की मानसिकता एक दूसरे के लिए और भी कुंठित होती जा रही है।

आज भारत में मूलत: दो हीं धर्म हैं एक सिनेमा और दूसरा क्रिकेट ऐसा मैं नहीं कहता मीडिया के आकलन में बार-बार कहा गया है य़ा लोगों ने खुद चिल्ला-चिल्ला कर कहा है।सुनकर अच्छा भी लगता है कि चलो विकास के इस दौर में जाति, धर्म, संप्रदाय वाली मानसिकता से उपर उठकर लोग सोच तो रहे हैं लेकिन ये क्या सारा गुड़ गोबर जब अपने पड़ोसी मुल्क से खेल के मैदान में मुकाबले की बात आते हीं वही कुंठित मानसिकता फिर से हमारे अंदर पनपने लगती है। वाह रे विकास, वाह रे समाज और वाह रे समाज की बदली मानसिकता।पाकिस्तान और भारत के बीच क्रिकेट विश्वकप का सेमीफाइनल मुकाबला जिस दिन से तय हुआ है मीडिया की तो मानो नींद गायब, चैन गायब एक हीं रंग हर चैनल पर हर जगह भारत-पाक मुकाबला मानो देश में कुछ और घट हीं नहीं रहा हो।इस बात को आमजन के जैहन तक पहूँचाने के लिए मीड़िया ने जिन शब्दों और भाषाओं का प्रयोग किया है ऐसा लगने लगा था भारत और पाक के बीच फिर से कारगिल युद्ध की शुरूआत होने वाली है और मीडिया जनता को इस भीषण महासंग्राम से रूबरू करा रही है। हाय रे मीडिया और वाह रे इनकी जिम्मेवारी क्या कमाल का काम किया था।दूसरी तरफ देश के प्रमुख पाक प्रमुखों को मैच देखने आने का न्योता भेजने में लगे थे पाक प्रमुखों ने निमंत्रण स्वीकार भी की और वे इस क्रिकेट के जरिये इस भारत पाक युद्ध के गवाह भी बने ये शब्द भी मेरे नहीं हैं बल्कि हमारी मीडिया के हीं हैं। भाई ये खेल का मुकाबला क्या हुआ मीडिया ने इसके लिए खेल को छोड़कर युद्ध, महायुद्ध, महासमर, ज़ंग, महासंग्राम, दुश्मनी का बदला, आर-पार की लड़ाई, महाजंग जैसे दोनों देशों के बीच से कुछ समय से खोये और सोये शब्दों को फिर से हल्लाबोल की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। एक चैनल ने तो तब हद कर दी जब इस मुकाबले पर अपने एक खास कार्यक्रम का शीर्षक चैनल ने दिया था भारत-पाक चौथा युद्ध।

भारत और पाक के बीच इस मैच को देखने आ रहे पाक और भारतीय प्रमुखों के मिलने से दोनों देशों के बीच रिश्ते मजबुत होंगे यह भी मीडिया का ही कहना था ऐसे में मीडिया का यह दो तरह का चेहरा आम लोगों के समझ से परे था। लेकिन हमारे राजनयिकों ने भी कहा कि इससे दोनो देशों के बीच रिश्तों में एक नयापन आयेगा अगर दोनों देशों के बीच इस खेल के जरिये रिश्ते बेहतर हो सकते हैं तो फिर दोनों देशों को थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद मैच खेलते रहना चाहिए था। आज तक तो दोनों देशों के बीच रिश्ते काफी मजबुत हो चुके होते।
ऐसे में आम जनता और मीडिया ने जो माहौल बना ड़ाला उससे खेल के अन्दर की खेल भावना का सम्मान बिल्कुल खत्म हो गया, उपर से मीडिया ने इस मुकाबले को ऐसे-ऐसे शब्दों से नवाजा कि भारत में धर्म के रूप में पूजे जाने वाले इस खेल की हार हो गई।भारत और पाक के खिलाड़ियों ने अपनी तरफ से पूरी तरह से खेल भावना का परिचय दिया दोनों के बीच काँटे की टक्कर रही भारत का पलड़ा भारी रहा और उसने पाकिस्तान से यह मैच जीतकर फाइनल में अपनी जगह बना ली।
इस मुकाबले के पहले दोनों देशों के कुछ आवारा वतनपरस्त लोग अपने–अपने देश की जीत की बात तक करते रहे और ये भी कह दिया कि अगर हमारा देश जीत गया और हम फाइनल हार भी गये फिर भी हम विश्वविजेता देश कहलायेंगे। ऐसी घटिया वतनपरस्ती का भी शिकार होता रहा यह भारत पाक मुकाबला। ये बात नई नहीं है कि ये बातें हो रही थीं हाँ ये जरूर नया है कि इतने सालों के बाद भी दोनों देशों को एक दूसरे के प्रति सोच में कोई बदलाव नहीं आया है।ऐसे में दोनों देशों की मीडिया, राजनेताओं, बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों के साथ-साथ दोनों देश के समाज के हर खासो-आम लोगों को यह कोशिश करनी पड़ेगी की वे एक दूसरे की भावनाओं, उनकी सोच का ख्याल रखें उनके बारे में अपने अंदर अच्छी राय कायम करें और एक दूसरे का सम्मान करने और सम्मान बचाने की चेष्टा करें तभी दोनों देशों के बीच संबंध मधुर होगों वरना 65 वर्षों से बिगड़े रिश्ते एक-आध मैचों से नहीं सुलझते ।
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